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दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन ने एक नवंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए 'महारैली' की.
इस रैली में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ़्रेंस, वामपंथी दलों और अन्य राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे.
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इस रैली को कामयाब बनाने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दी.
इस रैली की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी के आरोप, वोट चोरी के दावे और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग है.
विपक्षी दल यूं तो एसआईआर प्रक्रिया का विरोध पिछले साल इसके शुरू होने के बाद से ही कर रहे थे, लेकिन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग अभिजीत दीपके के नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने ही उठाई थी.
24 सितंबर को सीजेपी ने 'इलेक्शन कमीशन ठीक करो' अभियान की शुरुआत करते हुए 48 घंटों के भीतर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की.
वहीं, 2 अक्तूबर को सीजेपी ने मुंबई में बड़ा प्रदर्शन किया, जबकि छात्र संगठनों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का प्रयास किया.
इसके बाद से ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग एक बड़ा मुद्दा बन गई. सीजेपी ने 10 अक्तूबर को एक बड़े प्रोटेस्ट का आह्वान किया. 1 नवंबर की महारैली से पहले राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने भी कई प्रदर्शन किए.
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अब 1 नवंबर को इंडिया गठबंधन ने जब इसी मुख्य मांग के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली की, तब सीजेपी का नेतृत्व इससे दूर रहा.
हालांकि, 28 अक्तूबर को सीजेपी ने इंडिया गठबंधन की रैली के समर्थन का ऐलान तो किया था, लेकिन रविवार को रैली के दौरान सीजेपी इससे दूर ही नज़र आई.
28 अक्तूबर को सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "ज्ञानू को जाना होगा, सीजेपी इंडिया ब्लॉक की एक नवंबर की रैली का समर्थन करती है, राष्ट्र सर्वोपरि है."
हालांकि, रविवार को दिए एक बयान में दीपके ने कहा, "हम रैली का समर्थन करते हैं, लेकिन रैली में शामिल नहीं होंगे."
दीपके ने कहा कि वे रैली के मुद्दे का तो समर्थन करते हैं, लेकिन अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "हम साथ हैं, लेकिन सीजेपी एक स्वतंत्र और तटस्थ संगठन है और हम इसे ऐसा ही बनाए रखना चाहते हैं."
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शनिवार को पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाक़ात के बाद दीपके ने कहा, "कोई भी जो वोट चोरी के ख़िलाफ़ लड़ेगा, हम उसका समर्थन करेंगे."
रामलीला मैदान में सीजेपी के कई कार्यकर्ता तो ज़रूर नज़र आए, लेकिन कोई भी बड़ा चेहरा न मंच पर दिखा और न ही किसी का कोई बयान आया.
सीजेपी के प्रदर्शनों में शामिल होती रहीं एक युवती ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मैं सीजेपी से जुड़ी हुई हूं और आज रामलीला मैदान भी आई हूं. मेरे जैसे कई और कार्यकर्ता आपको यहां दिख जाएंगे. दरअसल, हमारा मुद्दा एक ही है."
वो कहती हैं, "सीजेपी व्यवस्था में बदलाव चाहती है और मेरे जैसे युवा इसी वजह से सीजेपी के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं. मैं मानती हूं कि वोट चोरी के ख़िलाफ़ इस रैली में शामिल होना किसी राजनीतिक दल के लिए समर्थन नहीं है."
इस युवती के साथ आए एक व्यक्ति ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "इस रैली में सीजेपी से जुड़े बहुत अधिक लोग नहीं आए हैं. कुछ युवा ज़रूर आए हैं, जो लगातार प्रोटेस्ट में शामिल हो रहे हैं."
सीजेपी कार्यकर्ता मोहम्मद जुनैद ने रामलीला मैदान में मीडिया से बात करते हुए कहा, "सीजेपी सुस्त नज़र नहीं आ रही है. रामलीला मैदान में भी बहुत से सीजेपी वर्कर और ज़ेन-जी प्रोटेस्टर आए हैं. हम सभी का उद्देश्य एक ही है और हम सब साथ हैं. सीजेपी की जो भी रणनीति है, वह बहुत जल्द ही दिखेगी और जल्द ही आह्वान होगा."
हालांकि, छात्र संगठन आईसा की अध्यक्ष नेहा बोरा मंच पर थीं और उन्होंने भाषण भी दिया.
नेहा बोरा ने अपने आक्रामक अंदाज़ में कहा, "आप कौन होते हैं हिंदुस्तान की आवाम को पूछने वाले कि तुम अपनी नागरिकता साबित करो."
कई और छात्र संगठनों के कार्यकर्ता भी बड़ी तादाद में रामलीला मैदान में हुई रैली में नज़र आए.
ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि इंडिया ब्लॉक की महारैली से दूरी बनाना सीजेपी की रणनीति है या मजबूरी?
क्या सीजेपी किसी राजनीतिक मंच के साथ नहीं दिखना चाहती?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि सीजेपी का इस रैली से दूर रहना उसकी रणनीति भी हो सकती है और मजबूरी भी.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "मेरे ख़्याल से राजनीतिक न दिखना उनकी रणनीति का हिस्सा है. आप इसे मजबूरी कह लें या रणनीति, दोनों बातें हो सकती हैं."
उनके मुताबिक, सीजेपी के लिए अपनी पहचान को अलग रखना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ उसके प्रदर्शनों में शामिल होने पर यह आलोचना हुई थी कि एक गैर-राजनीतिक आंदोलन अब राजनीतिक हो रहा है.
त्रिवेदी कहते हैं, "जब ये पहले आंदोलन में शामिल हो रहे थे और चुनाव आयोग को लेकर बात कर रहे थे, तो काफ़ी आलोचना हुई कि यह नॉन-पॉलिटिकल आंदोलन था. पहले राजनीति की बात नहीं कर रहे थे और अब राजनीति में आ गए. उस आरोप से बचने के लिए शायद ये कोशिश की गई हो."
हालांकि, त्रिवेदी यह भी मानते हैं कि सीजेपी पर किसी तरह का दबाव होने की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
वह कहते हैं, "यह भी हो सकता है कि कोई दबाव सरकार की तरफ़ से रहा हो और वे उससे दूरी बनाकर रखना चाहते हों."
त्रिवेदी के मुताबिक, सीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ उसके आंदोलन में अभी तक व्यापक जनसमर्थन नहीं दिखा है.
वह कहते हैं, "चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के आंदोलन में भी आम लोग बड़ी तादाद में नहीं जुड़ रहे हैं, कहीं न कहीं यह विरोध राजनीतिक बनकर रह गया है. रविवार की रैली में राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता अधिक थे. आम लोग उतनी बड़ी तादाद में नहीं थे."
विजय त्रिवेदी यह भी मानते हैं कि फिलहाल सीजेपी को आगे बढ़ने के लिए केवल मुद्दे की ज़रूरत नहीं, बल्कि संगठन और जनता के बीच संपर्क भी चाहिए.
त्रिवेदी कहते हैं, "जनता को लाने के लिए संगठन और सिस्टम चाहिए होता है. केवल मुद्दे से काम नहीं चलता. कांग्रेस के पास एक सिस्टम है और उसने इस मुद्दे पर भीड़ को जुटा लिया. सीजेपी में यह असमंजस है कि क्या वह इस मुद्दे पर लोगों को जोड़ पाएगी या नहीं."
त्रिवेदी मानते हैं कि सीजेपी के लिए यह तय करना आसान नहीं होगा कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर आगे कितना सक्रिय रहना है.
वह कहते हैं, "उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उनके साथ युवा जुड़े हैं और यह मुद्दा युवाओं को उतना आकर्षित नहीं कर रहा है. अब उन्हें यह असमंजस होगा कि अगर वे आगे बढ़ते हैं, तो समर्थन कितना मिलेगा."
समर्थन देना और मंच पर बैठना अलग-अलग बातें हैं
वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल के मुताबिक, सीजेपी की दूरी का एक अहम कारण यह हो सकता है कि वह अभी किसी राजनीतिक पार्टी या गठबंधन के साथ अपनी पहचान नहीं जोड़ना चाहती.
रावल कहते हैं, "मुझे लगता है कि फिलहाल वे किसी राजनीतिक पार्टी के साथ दिखना नहीं चाहते. अगर भविष्य में कोई ऐसी स्थिति पैदा होती है, जिससे कोई बड़ा आंदोलन उठता है, तो उनके ऊपर आरोप लगेंगे कि आप तो पहले ही एक तरफ़ चले गए थे."
रावल के मुताबिक, इंडिया गठबंधन की ओर से सीजेपी को साथ लाने की कोशिश भी हुई थी.
वह बताते हैं कि राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों की एक बैठक और चाय पर चर्चा के दौरान अभिजीत दीपके से भी संपर्क किया गया था. लेकिन उस समय दीपके की गिरफ्तारी और अन्य घटनाक्रमों के कारण बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी.
रावल कहते हैं, "विपक्षी पार्टियां बार-बार यही कह रही हैं कि यह एक ही प्रोटेस्ट है, दो अलग-अलग प्रोटेस्ट नहीं हैं. वे यह दिखाना नहीं चाहते कि हम दो अलग-अलग जगह प्रदर्शन कर रहे हैं."
उनके मुताबिक, विपक्षी दलों ने इस बार भी सीजेपी को साथ लाने की कोशिश की और उसके समर्थन का स्वागत किया, लेकिन सीजेपी ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने का फैसला किया.
रावल कहते हैं, "समर्थन देना एक अलग चीज़ है. मंच पर जाकर बैठना अलग चीज़ है. भविष्य की आंदोलनकारी राजनीति को देखते हुए सीजेपी इंडिया ब्लॉक के साथ आने में हिचक रही है और कहीं ना कहीं सीजेपी की यह रणनीति ठीक भी है."
क्या सीजेपी आगे भी आंदोलन करेगी?
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सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने दिवाली के बाद फिर से प्रदर्शन की तैयारी करने की बात कही थी.
ऐसे में सवाल है कि क्या संगठन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर आगे भी सक्रिय रहेगा?
विजय त्रिवेदी का मानना है कि सीजेपी इस मुद्दे पर आगे जाने के बारे में सोच रही होगी, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उसे कितना समर्थन मिलेगा.
वहीं, आदेश रावल का कहना है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है और किसी भी आंदोलन के भविष्य को पहले से तय नहीं किया जा सकता.
रावल जुलाई में पेपर लीक के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का उदाहरण देते हैं. उनके मुताबिक, उस आंदोलन में युवाओं और उनके माता-पिता की बड़ी भागीदारी ने सरकार पर दबाव बनाया था.
रावल कहते हैं, "जब पेपर लीक का मामला था, तो हर घर इससे जुड़ा हुआ था. हर मां-बाप अपने बच्चों को लेकर चिंतित थे. वह ऐसा मुद्दा था जो हर घर से जुड़ गया था."
उनके मुताबिक, वोट चोरी का मुद्दा भी हर घर से जुड़ा हुआ है, लेकिन उसे लेकर उसी तरह की व्यापक भागीदारी अभी दिखाई नहीं दी है.
रावल मानते हैं कि सीजेपी ने युवा पीढ़ी तक अपना संदेश पहुंचाने में भूमिका निभाई है.
उनके मुताबिक, सीजेपी के लिए आगे भी आंदोलन की संभावनाएं बनी हुई हैं और वह राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में प्रासंगिक रह सकती है.
सीजेपी की दूरी क्या बताती है?
विश्लेषक मानते हैं कि सीजेपी की इंडिया ब्लॉक महारैली से दूरी को केवल उसकी गैरमौजूदगी के तौर पर देखना इस घटनाक्रम को अधूरा समझना होगा.
एक तरफ़ संगठन ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग उठाई और इंडिया गठबंधन की महारैली का समर्थन किया. दूसरी तरफ़ उसने मंच पर अपनी मौजूदगी से परहेज़ किया.
विजय त्रिवेदी और आदेश रावल दोनों ही मानते हैं कि सीजेपी अपनी पहचान को लेकर सतर्क है. वह एक ऐसे आंदोलनकारी संगठन के तौर पर उभरना चाहती है, जो किसी राजनीतिक दल या गठबंधन से जुड़ा हुआ न दिखाई दे.
हालांकि विश्लेषक यह भी मानते हैं कि इस रणनीति के सामने एक चुनौती भी है.
त्रिवेदी कहते हैं, "किसी आंदोलन को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए केवल मुद्दा और सोशल मीडिया पर चर्चा पर्याप्त नहीं होती. उसे व्यापक जनसमर्थन, संगठनात्मक ढांचे और लगातार सक्रिय रहने की क्षमता की भी ज़रूरत होती है."
इंडिया गठबंधन की महारैली में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की बड़ी मौजूदगी थी, लेकिन आम लोगों की भागीदारी को लेकर सवाल उठे.
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